बिहार की राजनीति में एक बार फिर मुख्यमंत्री पद को लेकर जातीय समीकरणों की चर्चा तेज हो गई है। आगामी चुनावों को देखते हुए यह सवाल उठने लगा है कि आखिर बिहार का अगला मुख्यमंत्री किस जाति से होगा। राज्य की राजनीति में परंपरागत रूप से जातीय गणित का बड़ा प्रभाव रहा है और इसी आधार पर पार्टियां अपनी रणनीति तैयार कर रही हैं।
EBC और दलित वोट बैंक बना निर्णायक
बिहार में EBC (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) और दलित वर्ग की आबादी काफी बड़ी मानी जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार राज्य में लगभग 35% से ज्यादा आबादी EBC की है, जबकि दलित समुदाय की हिस्सेदारी भी करीब 19% के आसपास है। यही कारण है कि सभी बड़ी पार्टियां इन वर्गों को साधने की कोशिश कर रही हैं।
इसी वजह से यह चर्चा भी तेज है कि अगला मुख्यमंत्री इन वर्गों से भी हो सकता है।
BJP के अंदर भी चल रहा जातीय संतुलन
भारतीय जनता पार्टी में भी मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर कई नाम चर्चा में हैं। इनमें प्रमुख नाम हैं Samrat Choudhary और Vijay Kumar Sinha।
हालांकि दोनों नेताओं का मजबूत राजनीतिक आधार है, लेकिन बिहार में जातीय समीकरण इतना प्रभावी है कि पार्टी को उम्मीदवार तय करते समय सामाजिक संतुलन का भी ध्यान रखना पड़ सकता है।
गठबंधन राजनीति भी तय करेगी समीकरण
बिहार में मुख्यमंत्री पद का फैसला केवल एक पार्टी नहीं बल्कि गठबंधन की स्थिति भी तय करती है। वर्तमान राजनीति में Nitish Kumar का नाम अभी भी सबसे बड़ा माना जाता है, क्योंकि उनके पास EBC और महादलित वोट बैंक पर मजबूत पकड़ मानी जाती है।
विपक्ष भी तैयार कर रहा नई रणनीति
विपक्षी दल भी जातीय गणित के आधार पर अपनी रणनीति बना रहे हैं। खासकर युवा नेताओं को आगे लाकर नए सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश हो रही है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले चुनाव में EBC, दलित और पिछड़ा वर्ग के वोट ही मुख्यमंत्री की कुर्सी का फैसला कर सकते हैं।
