Nitish Kumar की राजनीति हमेशा शांत, संयमित और रणनीतिक मानी जाती है। लेकिन अब यह चर्चा तेज हो गई है कि उन्होंने अपने बेटे Nishant Kumar को राजनीति में स्थापित करने के लिए करीब एक दशक पहले ही योजना बनानी शुरू कर दी थी।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पिछले दस वर्षों में Janata Dal (United) यानी जेडीयू के अंदर कई बड़े बदलाव हुए। कई पुराने और प्रभावशाली नेताओं को धीरे-धीरे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया गया या उनकी राजनीतिक ताकत कम कर दी गई। इससे पार्टी के भीतर नेतृत्व का दायरा सीमित होता गया और अंतिम निर्णय लेने की शक्ति लगभग पूरी तरह मुख्यमंत्री के हाथ में आ गई।
विश्लेषकों के मुताबिक यह रणनीति अचानक नहीं बनी, बल्कि इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया। पहले पार्टी के अंदर संभावित चुनौती देने वाले नेताओं को कमजोर किया गया, फिर संगठन में अपने भरोसेमंद लोगों को अहम पदों पर बैठाया गया। इससे पार्टी की कमान पूरी तरह एक केंद्रीकृत ढांचे में आ गई।
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि आने वाले वर्षों में जब Bihar की राजनीति में नई पीढ़ी को जगह मिलेगी, तब निशांत कुमार को एक उत्तराधिकारी के रूप में पेश किया जा सकता है। हालांकि अब तक निशांत कुमार ने खुद सक्रिय राजनीति में आने को लेकर खुलकर कोई बयान नहीं दिया है।
दूसरी ओर जेडीयू के कई नेता इस तरह की अटकलों को खारिज करते हुए कहते हैं कि पार्टी में नेतृत्व का फैसला सामूहिक रूप से होता है और अभी भी पार्टी का पूरा फोकस विकास और सुशासन की राजनीति पर है।
फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में क्या सचमुच निशांत कुमार राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते हैं या यह सिर्फ राजनीतिक अटकलें ही साबित होती हैं। लेकिन इतना जरूर है कि बिहार की राजनीति में इस मुद्दे ने नई बहस छेड़ दी है।
