नई दिल्ली। लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से तीखे सवाल किए हैं। अदालत ने कहा कि वांगचुक के भाषणों का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने हिंसा पर चिंता जताई है और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने की अपील की है। ऐसे में यह बताएं कि उनके बयान में उकसावे जैसा क्या तत्व है?
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि वांगचुक के कुछ बयानों से क्षेत्र की संवेदनशीलता प्रभावित हो सकती है। सरकार ने यह भी कहा था कि उनके विचारों से लद्दाख को अलग दिशा में ले जाने की कोशिश की जा रही है, यहां तक कि यह आरोप भी लगाया गया कि वे “लद्दाख को नेपाल बनाने” जैसी सोच को बढ़ावा दे रहे थे।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील पर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल आशंका के आधार पर किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक नहीं लगाई जा सकती। अदालत ने कहा कि यदि भाषण में प्रत्यक्ष रूप से हिंसा भड़काने या कानून-व्यवस्था बिगाड़ने का स्पष्ट आह्वान नहीं है, तो इसे उकसावा कैसे माना जा सकता है?
वांगचुक की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल लगातार संविधान के दायरे में रहकर पर्यावरण संरक्षण, लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग उठा रहे हैं। उन्होंने कभी भी हिंसा का समर्थन नहीं किया, बल्कि युवाओं से शांति बनाए रखने की अपील की है।
मामले की अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से विस्तृत हलफनामा दाखिल करने को कहा है, जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि किन बयानों को आधार बनाकर कार्रवाई की गई। अदालत ने यह भी दोहराया कि लोकतंत्र में असहमति व्यक्त करना अपराध नहीं माना जा सकता, जब तक कि वह स्पष्ट रूप से हिंसा के लिए उकसाने वाला न हो।
इस मामले को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन के संदर्भ में अहम माना जा रहा है। अगली सुनवाई में केंद्र के जवाब पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी।
