नालंदा जिला में होली का रंग बिल्कुल अलग दिखाई देता है। जहां पूरे देश में होली पर रंग-गुलाल, ढोल-नगाड़ों और हुड़दंग का माहौल रहता है, वहीं जिले के पांच गांव ऐसे हैं जहां इस दिन न तो चूल्हा जलता है, न रंग खेला जाता है और न ही लोग एक-दूसरे पर पानी डालते हैं। यहां होली के दिन सन्नाटा और भक्ति का माहौल रहता है।
100 साल पुरानी परंपरा
स्थानीय लोगों के अनुसार, यह परंपरा करीब सौ साल से चली आ रही है। मान्यता है कि वर्षों पहले होली के दिन गांव में एक बड़ा हादसा हुआ था। कुछ लोगों की असमय मौत के बाद ग्रामीणों ने निर्णय लिया कि अब इस दिन कोई जश्न नहीं मनाया जाएगा। तभी से इन गांवों में होली का दिन शोक और संयम के रूप में मनाया जाता है।
नहीं जलता चूल्हा, नहीं बनते पकवान
जहां आमतौर पर होली पर गुजिया, मालपुआ और तरह-तरह के पकवान बनते हैं, वहीं इन गांवों में चूल्हा तक नहीं जलाया जाता। लोग एक दिन पहले ही खाना बनाकर रख लेते हैं और होली के दिन उपवास या सादा भोजन करते हैं।
रंग और पानी से परहेज
ग्रामीण मानते हैं कि रंग खेलने से उस पुरानी घटना की याद ताजा हो जाती है, इसलिए वे रंग, गुलाल और पानी का प्रयोग नहीं करते। बच्चे भी इस परंपरा का पालन करते हैं और घरों में ही रहते हैं।
हुड़दंग नहीं, हरिकीर्तन
जहां अन्य जगहों पर डीजे और तेज संगीत गूंजता है, वहीं इन गांवों में सुबह से ही भजन-कीर्तन शुरू हो जाता है। लोग मंदिरों में इकट्ठा होकर भगवान का स्मरण करते हैं और शांति की कामना करते हैं। हरिकीर्तन और पूजा-पाठ के जरिए वे उस दुखद घटना को याद करते हैं और समाज में सौहार्द बनाए रखने का संदेश देते हैं।
नई पीढ़ी भी निभा रही परंपरा
सबसे खास बात यह है कि नई पीढ़ी भी इस परंपरा को पूरी श्रद्धा से निभा रही है। युवाओं का कहना है कि यह सिर्फ एक रिवाज नहीं, बल्कि उनके पूर्वजों की याद और सम्मान से जुड़ी आस्था है।
प्रशासन भी करता है सम्मान
होली के दिन इन गांवों में प्रशासन भी अतिरिक्त सतर्कता बरतता है और परंपरा का सम्मान करता है। बाहरी लोगों को भी पहले से सूचना दे दी जाती है कि यहां रंग-गुलाल का कार्यक्रम नहीं होगा।
इस तरह, नालंदा जिला के ये पांच गांव देशभर में अपनी अनोखी परंपरा के लिए जाने जाते हैं, जहां होली का दिन उत्सव नहीं, बल्कि श्रद्धा और शांति के रूप में मनाया जाता है।
