होर्मुज संकट का असर हरियाणा के बासमती चावल कारोबार पर भी पड़ने लगा है। खाड़ी क्षेत्र में पैदा हुए तनाव के कारण समुद्री रास्तों से होने वाले चावल निर्यात को लेकर चिंता बढ़ गई है। एक्सपोर्टर्स का कहना है कि करीब 1 से 1.5 लाख टन भारतीय चावल रास्ते में फंसा हुआ है।
हरियाणा भारत के प्रमुख बासमती चावल उत्पादक और निर्यातक राज्यों में शामिल है। करनाल, पानीपत, कुरुक्षेत्र, कैथल और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी मात्रा में बासमती चावल की खरीद और प्रोसेसिंग होती है। यहां से तैयार चावल विदेशों में निर्यात किया जाता है।
होर्मुज क्षेत्र में संकट के कारण जहाजों की आवाजाही और समुद्री व्यापार प्रभावित होने की आशंका है। इसका सीधा असर उन निर्यातकों पर पड़ रहा है, जिनका माल समुद्री मार्ग से खाड़ी देशों और अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचता है।
एक्सपोर्टर्स के अनुसार, बड़ी मात्रा में भारतीय चावल समुद्री रास्ते में फंसा हुआ है। अगर स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो माल की डिलीवरी में देरी के साथ शिपिंग लागत भी बढ़ सकती है।
हरियाणा के चावल कारोबारियों को सबसे ज्यादा चिंता बासमती की सप्लाई और समय पर डिलीवरी को लेकर है। अंतरराष्ट्रीय खरीदारों तक माल पहुंचने में देरी होने पर व्यापारिक समझौतों और भुगतान व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।
एक्सपोर्टर्स का कहना है कि मौजूदा स्थिति में वैकल्पिक समुद्री या अन्य परिवहन मार्गों की व्यवस्था जरूरी है। उनका मानना है कि सरकार को निर्यातकों के साथ मिलकर ऐसा रास्ता तलाशना चाहिए, जिससे फंसे हुए चावल की सुरक्षित और जल्द डिलीवरी हो सके।
होर्मुज संकट का असर केवल निर्यात तक सीमित नहीं रह सकता। अगर परिवहन लागत बढ़ती है तो इसका प्रभाव चावल की कीमत, निर्यातकों के मुनाफे और किसानों से होने वाली खरीद पर भी पड़ सकता है।
हरियाणा के बासमती कारोबार से जुड़े लोगों की नजर अब अंतरराष्ट्रीय हालात और सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदमों पर है। एक्सपोर्टर्स चाहते हैं कि व्यापार को जारी रखने के लिए जल्द वैकल्पिक रास्ता उपलब्ध कराया जाए।
फिलहाल करीब 1 से 1.5 लाख टन भारतीय चावल के फंसे होने की बात एक्सपोर्ट सेक्टर की ओर से कही जा रही है। संकट लंबा खिंचने पर हरियाणा के बासमती कारोबार पर इसका असर और बढ़ सकता है।
