प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम निर्णय में स्पष्ट किया है कि बहू (पुत्रवधू) पर अपने सास‑ससुर का कानूनी रूप से भरण‑पोषण (गुज़ारा भत्ता) देने का कोई दायित्व नहीं है। कोर्ट ने आज (30 मार्च 2026) कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं है जो बहू को अपने सास‑ससुर के भरण‑पोषण के लिए बाध्य करता है।
यह आदेश जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने सुनाया, जिसमें यह बात दोहराई गई कि भरण‑पोषण का दायित्व केवल उन व्यक्तियों पर लगाया जा सकता है जिन्हें संबंधित कानून में स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है। सास‑ससुर को इस सूची में शामिल नहीं किया गया है, इसलिए उनकी गुज़ारा भत्ता की मांग को अदालत ने खारिज कर दिया।
मुख्य बातें
- सास‑ससुर की ओर से दायर भरण‑पोषण याचिका को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया।
- कोर्ट ने कहा कि “कानूनी दायित्व” और “नैतिक दायित्व” में अंतर है, और बिना स्पष्ट कानून के नैतिक दायित्व को लागू नहीं किया जा सकता।
- मामला एक ऐसे दंपत्ति का था, जिन्होंने तर्क दिया कि वे अपने नाबालिग बेटे पर पूरी‑तरह निर्भर थे और उनकी बहू जो यूपी पुलिस में कांस्टेबल हैं, के पास पर्याप्त आय है। अदालत ने इसे कानूनी आधार नहीं माना।
कोर्ट का तर्क
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय कानून के तहत भरण‑पोषण की जिम्मेदारी केवल उन्हीं पर लगाई जा सकती है जिन्हें विधान स्पष्ट तौर पर तय करता है (जैसे कि पति, बच्चे आदि)। सास‑ससुर को इस श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है, इसलिए बहू पर कोई कानूनी दायित्व नहीं ठहराया जा सकता।
सामाजिक‑कानूनी प्रभाव
विशेष रूप से जब बहू स्व‑निर्भर है या उसकी कोई आय है, तो ऐसे मामलों में कोर्ट ने यह साफ संदेश दिया है कि सामाजिक नैतिकता को कानून बनाने का आधार नहीं बनाया जा सकता। यह फैसला परिवारिक विवादों में कानूनी स्थिति को और स्पष्ट करेगा।
