वाराणसी। धर्मनगरी वाराणसी (काशी) में इस बार होली का अद्भुत और रहस्यमय स्वरूप देखने को मिला। मोक्षस्थली मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताओं की भस्म से संतों और नागा संन्यासियों ने होली खेली। डमरू और शंखनाद की गूंज, हर-हर महादेव के उद्घोष और भक्ति में डूबे साधुओं का अनोखा रूप देखने हजारों श्रद्धालु और देश-विदेश से आए पर्यटक उमड़ पड़े।
नरमुंड और भस्म से सजी अनोखी होली
रात होते ही घाट पर अलौकिक दृश्य बन गया। कई संन्यासी नरमुंड (प्रतीकात्मक खोपड़ी) और भस्म से सजे नजर आए। कुछ साधु आधुनिक अंदाज में चश्मा लगाए भी दिखे, लेकिन आस्था और साधना का भाव उतना ही गहरा था। मान्यता है कि भगवान शिव स्वयं काशी में विराजते हैं, इसलिए यहां भस्म की होली का विशेष आध्यात्मिक महत्व है।
संतों का कहना है कि यह होली जीवन और मृत्यु के सत्य का संदेश देती है—कि अंततः सब कुछ भस्म हो जाना है, इसलिए अहंकार छोड़कर भक्ति और मानवता को अपनाना चाहिए।
डमरू-नगाड़ों से गूंज उठी काशी
घाटों पर डमरू, नगाड़ों और मंत्रोच्चार की गूंज से माहौल शिवमय हो गया। विदेशी पर्यटक भी इस अनोखी परंपरा को अपने कैमरों में कैद करते नजर आए। प्रशासन के अनुसार करीब 3 लाख से अधिक टूरिस्ट और श्रद्धालु इस अवसर पर काशी पहुंचे।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम
भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन और पुलिस ने कड़े सुरक्षा इंतजाम किए। घाटों पर अतिरिक्त पुलिस बल तैनात रहा और ड्रोन कैमरों से निगरानी की गई। मेडिकल टीम और आपातकालीन सेवाएं भी अलर्ट रहीं।
आध्यात्म और उत्सव का संगम
काशी की यह भस्म होली सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि आध्यात्म और जीवन-दर्शन का अनूठा संगम है। जहां एक ओर रंगों की मस्ती है, वहीं दूसरी ओर मृत्यु के सत्य की स्वीकार्यता। यही कारण है कि हर साल यहां लाखों लोग इस अनोखी परंपरा के साक्षी बनने आते हैं।
काशी की गलियों और घाटों में गूंजता एक ही स्वर सुनाई दिया—
“हर-हर महादेव!”
