हजारीबाग (झारखंड) के इचाक प्रखंड स्थित हरहद गांव की किसान संगीता देवी ने मिश्रित खेती और जैविक कृषि मॉडल अपनाकर न सिर्फ अपनी आमदनी बढ़ाई, बल्कि पूरे गांव की खेती को देखने का नजरिया भी बदल दिया है। पारंपरिक खेती में लगातार बढ़ती लागत और घटते मुनाफे से परेशान संगीता देवी ने कुछ साल पहले खेती में बदलाव का फैसला किया और आज उनका मॉडल आसपास के गांवों के लिए प्रेरणा बन चुका है।
पारंपरिक खेती से जैविक मॉडल तक का सफर
संगीता देवी पहले धान और गेहूं जैसी एकल फसलों पर निर्भर थीं, जिसमें रासायनिक खाद और कीटनाशकों का अधिक इस्तेमाल होता था। लागत अधिक और मुनाफा सीमित रहने के कारण उन्होंने कृषि विशेषज्ञों से सलाह लेकर मिश्रित खेती और जैविक तरीकों को अपनाया। इसके तहत उन्होंने एक ही खेत में सब्जियां, दालें, तिलहन और फलदार पौधों की खेती शुरू की।
जैविक तरीकों से घटाई लागत
उन्होंने गोबर खाद, वर्मी कम्पोस्ट, जीवामृत और नीम आधारित जैविक कीटनाशकों का इस्तेमाल शुरू किया। इससे खेती की लागत में भारी कमी आई और मिट्टी की सेहत भी सुधरी। रासायनिक खाद से दूर रहने के कारण फसल की गुणवत्ता बेहतर हुई, जिसका बाजार में अच्छा दाम मिला।
आय में हुआ कई गुना इजाफा
मिश्रित खेती से साल भर अलग-अलग फसलें मिलने लगीं, जिससे आय का नियमित स्रोत बना। पहले जहां सालाना आय सीमित थी, वहीं अब संगीता देवी की आमदनी में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। सब्जियों और जैविक उत्पादों की स्थानीय बाजार में अच्छी मांग है, जिससे उन्हें सीधे उपभोक्ताओं से जुड़ने का मौका मिला।
गांव के किसानों की बदली सोच
संगीता देवी की सफलता देखकर हरहद गांव के कई किसान अब पारंपरिक खेती छोड़कर मिश्रित और जैविक खेती की ओर बढ़ रहे हैं। वे किसानों को अपने खेत दिखाकर जैविक खाद बनाने और फसल चक्र अपनाने की जानकारी भी देती हैं। गांव में अब रासायनिक खेती की जगह टिकाऊ और लाभकारी खेती पर चर्चा होने लगी है।
महिला किसानों के लिए बनी मिसाल
संगीता देवी का मानना है कि खेती में नवाचार और सही जानकारी से महिलाएं भी आत्मनिर्भर बन सकती हैं। उनकी सफलता ने यह साबित कर दिया है कि छोटे किसान भी अगर सही मॉडल अपनाएं तो कम लागत में बेहतर मुनाफा कमा सकते हैं।
हजारीबाग की यह कहानी न सिर्फ एक किसान की सफलता है, बल्कि टिकाऊ और प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ते कदमों का जीवंत उदाहरण भी है।
