देश में बोरवेल में बच्चों के गिरने की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं। इन हादसों के बाद कई बड़े रेस्क्यू ऑपरेशन चलाए गए, जिनमें कुछ बच्चों को सुरक्षित बचा लिया गया, जबकि कुछ मामलों में लंबी कोशिशों के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी।
सबसे चर्चित मामलों में कुरुक्षेत्र के प्रिंस का रेस्क्यू ऑपरेशन शामिल है। वर्ष 2006 में प्रिंस करीब 50 घंटे तक बोरवेल में फंसा रहा। सेना, प्रशासन और बचाव दलों की संयुक्त कार्रवाई के बाद उसे सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया था। यह अभियान पूरे देश में चर्चा का विषय बना था।
इसी तरह पंजाब में भी एक बच्चे को निकालने के लिए करीब चार दिनों तक लगातार रेस्क्यू अभियान चलाया गया। बचाव दलों ने आधुनिक मशीनों, समानांतर गड्ढों और विशेष तकनीकों का इस्तेमाल किया। हालांकि, सभी अभियानों का अंत सुखद नहीं रहा।
देश में ऐसे कई मामले भी सामने आए, जहां रेस्क्यू टीमों ने घंटों या कई दिनों तक प्रयास किए, लेकिन तीन बच्चों को जीवित नहीं बचाया जा सका। इन घटनाओं ने खुले और असुरक्षित बोरवेलों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे हादसों को रोकने के लिए खुले बोरवेलों को तुरंत बंद करना, सुरक्षा मानकों का पालन करना और नियमित निगरानी बेहद जरूरी है। प्रशासन भी समय-समय पर ऐसे निर्देश जारी करता है, ताकि भविष्य में इस तरह की दुखद घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। प्रत्येक घटना ने यह संदेश दिया है कि लापरवाही की छोटी-सी चूक भी बड़ी त्रासदी का कारण बन सकती है।
