राज्य की विधानसभा में आज धर्म परिवर्तन के मुद्दे पर जोरदार हंगामा देखने को मिला। सत्तारूढ़ दल Bharatiya Janata Party (BJP) के विधायकों ने प्रदेश में कथित अवैध धर्म परिवर्तन की घटनाओं का मुद्दा उठाते हुए कड़े कानून बनाने की मांग की। पार्टी के नेताओं ने आरोप लगाया कि सुनियोजित तरीके से भोली-भाली लड़कियों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है।
विधानसभा में क्या बोले BJP विधायक?
बहस के दौरान BJP विधायकों ने कहा कि कुछ मुस्लिम युवक हिन्दू लड़कियों को प्रेमजाल में फंसाकर शादी के नाम पर धर्म परिवर्तन करवा रहे हैं। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि कुछ ईसाई मिशनरी संगठन गरीब और जरूरतमंद लोगों को लालच देकर उनका धर्म परिवर्तन करवा रहे हैं।
पार्टी नेताओं ने कहा कि यह केवल सामाजिक नहीं, बल्कि “सांस्कृतिक सुरक्षा” का भी विषय है। उन्होंने सरकार से मांग की कि अन्य राज्यों की तर्ज पर प्रदेश में भी सख्त एंटी-कन्वर्जन कानून लागू किया जाए।
विपक्ष ने आरोपों को बताया बेबुनियाद
विपक्षी दलों ने BJP के आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया। उनका कहना था कि इस तरह के बयान समाज में विभाजन पैदा करते हैं और बिना ठोस आंकड़ों के पूरे समुदाय को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं है। विपक्ष ने कहा कि यदि कोई जबरन धर्म परिवर्तन कराता है तो मौजूदा कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
पहले से किन राज्यों में हैं कानून?
देश के कई राज्यों—जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड—में पहले से ही धर्म परिवर्तन को लेकर विशेष कानून लागू हैं। इन कानूनों के तहत धोखे, दबाव, प्रलोभन या जबरन धर्म परिवर्तन को दंडनीय अपराध माना गया है। BJP विधायकों ने इन्हीं राज्यों का उदाहरण देते हुए अपने राज्य में भी ऐसा कानून लाने की मांग दोहराई।
सरकार का क्या रुख?
गृह विभाग की ओर से जवाब देते हुए कहा गया कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है और कानून विशेषज्ञों से राय लेकर आगे की रणनीति तय की जाएगी। फिलहाल इस विषय को विचाराधीन रखा गया है।
सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रिया
कुछ सामाजिक संगठनों ने धर्म परिवर्तन के खिलाफ सख्त कानून का समर्थन किया है, जबकि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन और परिवर्तन करने की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में कानून बनाते समय मौलिक अधिकारों का ध्यान रखना जरूरी है।
धर्म परिवर्तन का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में आ गया है। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि सरकार इस पर क्या ठोस कदम उठाती है और क्या विधानसभा में इस संबंध में कोई विधेयक पेश किया जाता है।
