भारतीय मुद्रा रुपया ने विदेशी मुद्रा बाजार में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज करते हुए पहली बार 92.05 प्रति डॉलर का स्तर छू लिया। डॉलर के मुकाबले यह अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, खासकर इजराइल और ईरान के बीच युद्ध जैसी स्थिति, इस गिरावट का बड़ा कारण है।
युद्ध का असर वैश्विक बाजारों पर
इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ गई है। निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ है। डॉलर की मजबूती का सीधा असर उभरते बाजारों की मुद्राओं पर पड़ा है, जिसमें भारतीय रुपया भी शामिल है।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें बनीं वजह
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। युद्ध की आशंका से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। जब कच्चा तेल महंगा होता है तो भारत को ज्यादा डॉलर चुकाने पड़ते हैं, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतों में और बढ़ोतरी हुई तो रुपया और कमजोर हो सकता है।
विदेशी निवेश में गिरावट
बाजार में अस्थिरता के कारण विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ी है और रुपये की कीमत में गिरावट आई है।
आम लोगों पर क्या होगा असर?
- आयातित सामान जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल, लैपटॉप और पेट्रोल-डीजल महंगे हो सकते हैं।
- विदेश यात्रा और विदेशी शिक्षा का खर्च बढ़ेगा।
- महंगाई दर पर भी दबाव बढ़ सकता है।
RBI की नजर
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि यदि रुपये में गिरावट जारी रहती है तो भारतीय रिजर्व बैंक हस्तक्षेप कर सकता है। जरूरत पड़ने पर डॉलर बेचकर बाजार में स्थिरता लाने की कोशिश की जा सकती है।
